
सूफ़ी कविता प्रेम की कविता है और अगर गायक नुसरत जैसा हो तो इस प्रेम कविता को चार चाँद लग जाते है। रूह की जिन गहराइयों को से सूफ़ी कविता निकलती है उन्ही गहराइयों को प्रतिध्वनित करता है बाबा नुसरत का गायन। उनके गायन में एक सम्मोहन सा है और वे ख़ुद भी किसी सम्मोहन में गाते हुए लगते हैं। ऐसी तल्लीनता शायद ही किसी और गायक में मिले। उनके भतीजे और शिष्य राहत नुसरत फतह अली खान , जिन्हें बाबा नुसरत ने १२ साल की उम्र में ही अपनी शागिर्दी में ले लिया था, को भी उनका यह गुन विरासत में मिला है। (यद्यपि आज कल वे कुछ भटक गए से लगते हैं)। आइये आज इन्ही महान गुरु और उसके योग्य शिष्य का गायन सुनते है। पहले बड़े खान साहब की आवाज़ में 'नित खैर मँगा तेरे दम दी....' फ़िर राहत की आवाज़ में ' सानू एक पल चैन न आवे....'