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Sunday, October 26, 2008

जो मैं भी हूँ और तुम भी हो......

आप सभी को दीपावली की हार्दिक शुभकामनाएं। यह प्रकाशपर्व हम सब के जीवन को और मन-प्राण को नवप्रकाश से भर दे। इन्ही दुआओं के साथ पेश है अव्यवस्था और अत्याचार के अंधेरों के विरुद्ध प्रकाश का आवाह्न करती फैज़ अहमद फैज़ की यह नज़्म। इक़बाल बानो की शानदार गायकी ने इसे और भी असरदार बना दिया है। अच्छी कविता और अच्छे संगीत का शानदार संयोग-




हम देखेंगे
लाज़िम है के हम भी देखेंगे
वो दिन के जिस का वादा है
जो लौह-ए-अज़ल में लिखा है ।

जब ज़ुल्म-ओ-सितम के कोहेगराँ
रूई की तरह उड़ जायेंगे
हम महकूमों के पाँव तले
ये धरती धड़ धड़ धड़केगी
और अहलेहकम के सर ऊपर
जब बिज़ली कड़ कड़ कड़केगी ।

जब अर्जेख़ुदा के काबे से
सब बुत उठवाये जायेंगे
हम अहलेसफ़ा मरदूदेहरम
मसनद पे बिठाये जायेंगे
सब ताज उछाले जायेंगे
सब तख्त गिराए जायेंगे।

बस नाम रहेगा अल्लाह का
जो गायब भी है हाज़िर भी
जो मंज़र भी है नाज़िर भी
उठेगा अनलहक़ का नारा
जो मैं भी हूँ और तुम भी हो
और राज करेगी ख़ल्क़-ए-ख़ुदा
जो मैं भी हूँ और तुम भी हो।

Wednesday, September 17, 2008

राम करें कही नैना न उलझें

राम चरित मानस में तुलसीदास जी ने एक प्रसंग का बहुत सुंदर वर्णन किया है - पुष्प-वाटिका में राम सीता को और सीता राम को देखते हैं और दोनों एक दूसरे को अपलक देखते रह जाते है-
'भए विलोचन चारु अचंचल,
मनहु सकुचि निमी तजे दिगंचल।
दोनों के सुंदर नयन स्थिर हो गए हैं। मानो इस प्रेम सिक्त युगल को देख संकोच वश निमी (राजा जनक के एक पूर्वज जो कथानुसार पलकों पर बसते है और इसी कारण पलकें झपकती है. पलकों के झपकने के बीच के समय को निमिष कहते हैं) पलकों पर से हट गए हैं। नैनों का प्रेम की दुनिया में विशेष स्थान है। तभी तो फकीर कहता है -
'कागा सब तन खाइयों चुन चुन खइयो मांस ,
दो नैना मत खाइयो इन्हें पिया दरश की आश।
लीजिए नैनों की यही कहानी इकबाल बानो की आवाज़ में आप भी सुनिए-


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