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Sunday, April 26, 2009

काश पढ़ सकता किसी सूरत से तू आयाते-इश्क़.....


आइये आज फ़िर जिक्र करें महान शायर फ़िराक गोरखपुरी साहब का। यह उस शायर का जिक्र है जो हजार खराबियों के बाद भी जिंदगी को खुल्दे-बरीं पर तरजीह देता है। जो जिंदगी का शायर है, विवेक का शायर है। जो प्रेम को शारीरिक रति मात्र से निकाल कर उस बौधिक धरातल पर ले जाता है जहाँ भाव और विचार एकमेव हो जाते हैं। फ़िराक का प्रेम एक कोरी भावुकता नहीं एक विवेकशील अनुभूति है । उनकी शायरी केवल आह-आह और वाह-वाह की कविता नहीं बल्कि जीवन और समाज को गहरे तक रेखांकित करती है । पेश हैं फ़िराक के कुछ शे'र-

हिन्दी के एक लोकगीत के बोल है -

जल मा चमके उजारी मछरिया, रन चमके तरवार,
सभा में चमके मोरे सैयां की पगडिया, सेजिया पे बिंदिया हमार।

फ़िराक साहब ने इसी ले में एक नज़्म कही है -तराना-ए-इश्क ---

जलवा-ए-गुल को बुलबुल बहुत है शमा को गिरा-ए-शाम
बाड़े-बहारी गुल को बहुत है मुझ को तेरा नाम ।

बिजली चमके काली घटा में जाम में आतशे-सर्द
चमके राख जोगी की जता में मुझमें तेरा दर्द।

शाख पर शोल-ए-गुल की लपक हो चर्ख प अन्जुमो-माह
दुनिया पर सूरज की चमक हो मुझ पर तेरी निगाह।

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बस इक सितारा-ए-शंगर्फ़1 की जबीं प झमक
वो चाल जिससे लबालब गुलाबियाँ छलकें
सुकूं नुमा खमे-आबरू ये अधखुली पलकें
हर इक निगाह से ऐमन की बिजलियाँ लपके
ये आँख जिसमें कई आशमा दिखाई पड़ें
उड़ा दे होश वो कानों की सादा सादा लावें
घतायं वज्द में आयें ये गेसुओं की लटक !

ये कैफों-रंग नज़ारा ये बिजलियों की लपक
कि जैसे कृष्ण से राधा कि आँख इशारे करे
वो शोख इशारे कि रब्बानियत2 भी जाए झपक
जमाल सर से कदम तक तमाम शोला है
सुकूनो-जुम्बिशो-रम तक तमाम शोला है
मगर वो शोला कि आंखों में दाल दे ठंडक।

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है अभी माहताब बाक़ी और बाक़ी है शराब
और बाक़ी तेरे मेरे दरम्याँ सदहा3 हिसाब।

दिल में यूँ बेदार4 होते है ख़यालाते-ग़ज़ल
आँख मलते जिस तरह उट्ठे कोई मस्ते-शबाब।

चूड़ियाँ बजती है दिल में, मरहबा5, वज़्मे-ख़याल
खिलते जाते हैं निगाहों में जबीनों6 के गुलाब।

काश पढ़ सकता किसी सूरत से तू आयाते-इश्क़
अहले-दिल भी तो हैं ऐ शैखे-ज़माँ , अहले-किताब।

एक आलम पर नहीं रहती हैं कैफ़ीयाते-इश्क़
गाह रेगिस्ताँ भी दरिया, गाह दरिया भी सुराब7।

आ रहा है नाज़ से सिम्ते-चमन को खशखिराम8
दोश पर वो गेशू-ऐ-शबगूं9 के मंडलाते साहब10।

हुस्न ख़ुद अपना नकीब, आंखों को देता है पयाम
आमद-आमद आफ़ताब, आमद दलीले-आफ़ताब।

अज़मते- तक़दीर-आदम अहले-मज़हब से न पूछ
जो मशिअत ने न देखे, दिल ने वो देखे हैं ख़ाब।

हर नज़र जलवा है हर जलवा नज़र, हैरान हूँ
आज किस बैतुलहरम11 में हो गया हूँ बारयाब12।

सर से पा तक हुस्न है साजे-नमू13 राज़-नमू14
आ रहा है एक कमसिन पर दबे पावों शबाब।

ऐ 'फ़िराक' उठती हैहैरत को निगाहें बा अदब
अपने दिल कि खिलावातों में हो रहा हूँ बारयाब।

१= लाल सितारा, २= ईश्वरत्व , ३= सैकड़ों, ४= जाग्रत, ५= धन्य हो, ६= माथा, ७= मृगत्रिष्णा, ८= अच्छी चाल वाला, ९= रात की तरह बाल वाला, १०= बादल, ११= अल्लाह का घर, १२= प्रवेश प्राप्त, १३= उत्पन्न गीत , १४= उत्पत्ति का मर्म,
(पेंटिंग -बाबा शोभा सिंह)

अब पेश है जगजीत और चित्रा सिंह की आवाज़ में यह ग़ज़ल-


Tuesday, September 30, 2008

तुझे प्यार करते करते


जिक्र फ़िर उसी फनकार का है जिसे जितना सुनिए उतनी ही सुनाने की इच्छा होती है। जी हाँ मैं बात कर रहा हूँ मेहंदी हसन साहब की। उन्होंने जीतनी बढिया गज़लें गई हैं उतने ही अच्छे गाने फिल्मों के लिए भी गाए हैं। उन्ही गानों में से मैं आज आपको अपना पसंदीदा गीत सुनवा रहा हों। जितना अच्छा मेहंदी हसन जी ने गाया है, उतने ही अच्छे बोल हैं। मुझे गीत का नाम नहीं मालूम है। यदि आपमें से किसी को ज्ञात हो तो बताइएगा। लीजिए तुझे प्यार करते-करते मेरी उम्र बीत जाए.....


Saturday, August 30, 2008

अहमद फ़राज़ साहेब को श्रद्धांजलि

अहमद फ़राज़ साहेब को श्रद्धांजलि स्वरूप उन्ही की यह ग़ज़ल मेहँदी हसन की आवाज़ में -



रंजिश ही सही दिल ही दुखाने के लिए आ ,
आ फ़िर से मुझे छोड़ के जाने के लिए आ।


पहले से मरासिम न सही फ़िर भी कभी तो,
रस्मो-रहे-दुनिया ही निभाने के लिए आ।


किस-किस को बताएँगे जुदाई का सबब हम,
तू मुझ से खफा है तो जमाने के लिए आ।


अब तक दिले खुशफहम को तुझसे है उम्मीदे,
ऐ आखरी शम्मे भी बुझाने के लिए आ।


MusicPlaylist


एक और ग़ज़ल पेश है-


अबके हम बिछड़े तो शायद कभी ख़्वाबों में मिलें।

जिस तरह सूखे हुए फूल किताबों में मिलें ।

उजड़े हुए लोगों में वफ़ा के मोती

ये ख़ज़ाने तुझे मुम्किन है ख़राबों में मिलें

तू ख़ुदा है न मेरा इश्क़ फ़रिश्तों जैसा

दोनों इन्साँ हैं तो क्यों इतने हिजाबों में मिलें।

गम-ए-दुनिया भी ग़म-ए-यार में शामिल कर लो

नशा बढ़ता है शराबें जो शराबों में मिलें।

आज हम दार पे खेंचे गये जिन बातों पर

क्या अजब कल वो ज़माने को निसाबों में मिलें।

अब न वो मैं हूँ न तू है न वो माज़ी है ‘फ़राज़',

जैसे दो शख़्स तमन्ना के सराबों में मिलें।


MusicPlaylist

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