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Saturday, September 27, 2008

उड़ जाएगा हंस अकेला...

जब एक दिन
सब कुछ रुक जाएगा
रुक जाएगा साँसों का तूफ़ान
रुक जाएगी धड़कन सीने की
जिस्म की हरारत
ठंडी पड़ जाएगी ।
जब वक्त की हथेली
तुम्हे ले लेगी
अपनी मजबूत गिरफ्त में।
तब जब मिट जाएगा
हर चिन्ह ।
और तुम डाल से टूटे
पत्ते की मानिंद
फ़िर न मिल पाओगे
कभी अपने अपनों से।
तब तुम्हारे साथ होगी बस
तुम्हारे अच्छे बुरे कामो की
फेरहिस्त ।
जो बोया होगा तुमने
काटोगे भी वही।

जीवन नश्वर है इस सत्य का बोध जिस को हो जाता है वह कबीर हो जाता है, बुद्ध हो जाता है। कबीर और कुमार गन्धर्व एक मणिकांचन सयोग है। लीजिए कबीर का यह भजन सुनिए कुमार गन्धर्व जी की आवाज़ में...





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