Tuesday, September 23, 2008

एही ठइयां मोतिया हेराय गइलीं रामा

मेरे विचार से किसी गीत के अच्छा होने के लिए अच्छी कविता के साथ अच्छे गायन का संगम होना आवश्यक है। मुझे संगीत की समझ बस इतनी है कि जो मेरे मन को अच्छा लगे वाही अच्छा संगीत है। इस लिए अच्छे संगीत की पहचान मैं कान से करता हूँ दिमाग से नहीं। संभवत आनंद का सृजन ही हर कला का मूल उद्देश्य भी है।ठुमरी सुनाने का अपना एक अलग आनंद है। लीजिए निर्मला देवी की आवाज़ के यह खुबसूरत ठुमरी आप भी सुनिए -


ehi thaiyan motiya.mp3

4 comments:

Udan Tashtari said...

जबरदस्त!! आभार सुनवाने का.

sidheshwer said...

निर्मला जी के स्वर में यह गीत सुनकर बहुत आनंद आया. इस गीत ने एक काम और किया, इसने मुझे आज से बीस-पच्चीस साल पहले के अपने गांव में पहुंचा दिया जब फ़गुआ बीतने पर चैता गायन की शुरुआत होती थी.
बहुत बढ़िया प्रस्तुति.आपके खजाने में बहुत रत्न हैं.ऐसे ही झलक दिखलाते रहें!

Parul said...

बहुत बढ़िया......आभार

ललितमोहन त्रिवेदी said...

निर्मला जी की यह चैती बहुत पहले सुनी थी ,आज वही भूले बिसरे दिन याद हो आए !आभार !

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