Saturday, September 20, 2008

उम्र जलवों में बसर हो



जगजीत सिंह की आवाज़ हो तो ग़ज़ल का सुरूर और बढ़ जाता है। एक पीढी उनकी गज़लें सुनते हुए बड़ी हुई है। मगर वे आज की पीढ़ी में भी उतने ही मकबूल हैं जितने की हमारी। उनकी मखमली आवाज़ का जादू अब तक न जाने कितनो को दीवाना बना चुका है। आज मैं आपको उनकी एक पुरानी ग़ज़ल सुनवाता हूँ। खामोश देहलवी की इस ग़ज़ल को जगजीत जी ने बड़े मूड से गाया है। लीजिए हाज़िर है -




उम्र जलवों में बसर हो ये ज़रूरीतो नहीं
हर शबे-ग़म की सहर हो ये ज़रूरीतो नहीं

चश्मेसाकी से पियो या लबे सागर से पियो ,
बेखुदी आठो पहर हो ये जरुरी तो नहीं।

नींद तो दर्द के बिस्तर पे भी आ सकती है,
उनकी आगोश में सर हो ये ज़रूरी तो नहीं।

शेख करता तो है मस्जिद में ख़ुदा को सज़दे,
उसके सज़दों में असर हो ये ज़रूरी तो नहीं।

सब की नज़रों में हो साकी ये ज़रूरी है मगर ,
सब पे साकी की नज़र हो ये ज़रूरी तो नहीं।

6 comments:

Dr Prabhat Tandon said...

शुक्रिया !! यह मेरी भी पसंदीदा गजलों मे से हैं !

Udan Tashtari said...

आभार इस गजल के लिए.

Manish Kumar said...

मुझे भी बेहद पसंद रही है ये...यहाँ फिर सुनवाने का शुक्रिया

पोटलीवाला बाबा said...

उम्र जलवों में बशर हो ऐ जरूरी तो नहीं
हर शबेगम की सहर हो ऐ जरुरी तो नहीं।

दद्दू
ये बशर को बसर,
जरूरी को ज़रूरी
शबेगम मो शबेग़म
और ऐ को ये
कर दो ना पलीज (प्लीज़)

एस. बी. सिंह said...

dhanyavaad baba

Amrish said...

इसका संगीत संयोजन और पार्श्व में बजते वाद्यों ने इसे और भी कर्णप्रिय बना दिया है...

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